Thursday, June 8, 2017

जाने कैसे





इतनी चुप मैं हो गयी कैसे ?
खुद से बाते करते करते।
टूट के सपने चुभ ना जाएँ,
जाने सब कब सो गए कैसे ?
जाने कैसे ? जाने कैसे ?

सांसें गिरवी हो गयी कैसे ?
दिल का पहरा करते करते।
आँख से आंसू गिर न पाए ,
मन जी भर के रो लिया कैसे ?
जाने कैसे ? जाने कैसे ?

इतने हिस्से बाँट गयी कैसे ?
पग पग संभल के चलते चलते।
जख्म किसी को दिख ना जाएँ।,
दर्द ही मरहम बन गया कैसे ?
जाने कैसे ? जाने कैसे ?
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खुद को जान लिया यूँ कैसे ?
तेरा चेहरा पढ़ते पढ़ते।
ना कोई कस्मे ,ना कोई बंधन,
मन के धागे जुड़ गए कैसे ?
जाने कैसे ? जाने कैसे ?

Wednesday, May 10, 2017

जवाब



मखमली रात को मदहोश करती चंपा की खुशबू 
बारिश की टिप -टिप पे लय देती साँसों की सरगम 
बेपरवाह बिखरे काले रेशम के धागे 

सफ़ेद चादर पे खींचते अरमानो के खाके
.
आज फिर उसने गीले बालों को धो कर खुला छोड़ दिया है
और बेसुध सी खोयी है मन में फूटते सपनो के फव्वारे में
एक अलसायी सी अंगड़ाई लेकर खोली जो आँखें
हंसने लगी कमरे की चारों दीवारे
.
नहीं आज नहीं डरेगी, ना ही चिड़ेगी इनकी हंसी से
और शामिल हो गयी उसी अठ्ठाहस में
रंग डाले एक एक कर सारे कोरे पन्ने
हर पन्ने पर उकेरती मन की तस्वीर
.
कहीं प्रेम और समर्पण , कहीं दर्द की साझेदारी
कहीं उमंगों की महफ़िल, कहीं ज़िन्दगी की जिजीविषा
अवाक थी दीवारे और मूक थी रात
दे रही थी रचनाये उनकी हर हंसी का जवाब 

Saturday, April 15, 2017

शून्यता


.
हूक अब भी उठती है 
पर कंठ से शब्द नहीं फूटते 
बस मन के अंदर उमड़ घुमड़ कर 

भरे भरे बादल बिन बरसे
भाप से सीधे बर्फ हो जाते हैं।
शीतलता ठंडक देती है ,
पर बिना पानी के प्यास नहीं बुझती।
.
पीर अब भी होती है
पर आँख नम नहीं होती
कब सिमट गया वो उद्धण्ड़ झरना
जो दिल की दीवारों से हिलोरे लेकर
छलक छलक जाया करता था।
मर्यादा संयम देती है ,
पर बिना बहाव के मंज़िल नहीं मिलती।
.
विचार अब भी सुलगते है
पर आंच नहीं लगती
बुझी बुझी सी राख में
दबी चिंगारी को भड़काने
अब आंधी नहीं आया करती।
शून्यता शान्ति देती है ,
पर बिना हवा के सांस नहीं चलती।

Wednesday, April 12, 2017

ख्वाहिशें





ख्वाहिशें सिमट कर रह जाती हैं
सहमी हुयी सी, .... अधूरी सी
आवश्यकताओं और अनावश्यकताओं के 
भंवर जाल में फंस कर
कसमसाती सी ....बेबस सी
बस कल और आज की उम्मीद मैं
इंतज़ार की घड़ियाँ गिन गिन कर
पूरी होने की आस पथरीली आँखों में लिए
सिसकती हुयी ... दम तोड़ती हुयी
दफ़न हो जाती हैं मन के किसी बियाबान कोने मैं

Thursday, March 23, 2017

भीगी - भीगी होली



अर्शी , ओ अर्शी 
मेरी आवाज़ कानो मैं पड़ते ही 
ढाई साल की नन्ही अर्शी माँ का हाथ खींचते हुए आयी 
जल्दी चलो माँ, आंटी बुला रही हैं
बगल के घर के पिछवाड़े का दरवाजा खुला
और दोनों घरों के दालान के बीच बनी
दो फुट की दीवार के पास आकर
नन्ही अर्शी कौतहुल से मुझे देखने लगी
.
मैंने जैसे ही गुझिया, दही वड़े
और पूरी आलू से सजी प्लेट को
" हैप्पी होली अर्शी" कहते उसके सामने बढ़ाई
अर्शी का चेहरा दही वड़े की तरह चमक उठा
और उसके चेहरे की मुस्कराहट मैं बिखरते
चटनी, सोंठ, और मसाले के रंग
और उन सारे रंगों की छटा से रंगीन होता
मेरे मन का हर कोना - कोना
.
आज इतनी सारी चीजे आंटी
हां , आज होली है ना बेटा अच्छी तरह से खाना
और उसके बाद ये ठंडाई भी पी लेना
नन्हे हाथों से गिलास थामते अर्शी के हाथ
हर रोज़ के रोटी और अचार की जगह
आज इतने सारे व्यंजन
माँ - बेटी के गद -गद ह्रदय से बरसते भाव
मुझे पूरा सराबोर कर गए
.
और इस तरह से मनी मेरी
इस बार की भीगी - भीगी होली,
एक सार्थक होली।

Saturday, December 24, 2016

बंधन


रोज़ सुबह उठते ही मेरा उसको रोटी 
खिलने का नियम है 
और वो भी बेसब्री से मेरा इंतज़ार करता है 
कभी घर के पिछवाड़े दालान की मुंडेर के पास,
तो कभी दालान के चबूतरे पर बैठ कर
दरवाजा खोलते ही टकटकी बांधे
उसकी नज़रें मुझे ही देखती रहती
कोई कारणवश कभी देर हो जाए
तो बेसब्र हो कर कमरे की चौखट पर आकर
मूक हाजिरी दे देना उसका
बिना एक शब्द बोले उसका मौन इंतज़ार
और फिर भी मैं, ना ध्यान दूँ तो
मेरे आगे पीछे मंडराना उसका
जब तक की मैं उसे रोटी न खिला दूँ
रोटी डालते ही चोंच में जल्दी जल्दी कुछ टुकड़े दबाकर
पास खड़े घने कटहल पे पेड़ पर उड़ जाना
शायद अपने बच्चो को खाना खिलाकर
फिर आकर रोटी बटोरने लग जाना
अब मैं भी ध्यान रखती हूँ उसका
रात को ही एक रोटी उसके नाम की
अलग से डब्बे मैं बनाकर रखती हूँ
और सुबह उठकर
सबसे पहले उसको चुगाती हूँ
एक अलग ही अनुभूति है ये भी
सोचती हूँ क्या रिश्ता है
इस कौवे का मुझसे
प्रेम का, विश्वास का, अपनत्व का
.
सच में कुछ बंधन ऐसे होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं 

Friday, December 9, 2016

हम सफर


रेलगाड़ी की दो पटरियों को देखकर 
अचानक एक ख्याल मन में कौंधा 
कि क्या हम भी इन्ही दो पटरियों की तरह नहीं हैं 
ज़िन्दगी के रास्तों पर निरंतर चलते हुए
ना ज्यादा दूर, ना और नज़दीक
बस एक निश्चित दूरी को बनाये हुए
चलते जा रहे हों दिन रात
नए मोड़ों से गुज़रते
मंज़िल से बेखबर
किसी पड़ाव पर ज़रा थमते
फिर अनजानी राहों पर आगे बढ़ते
ग़म ये नहीं की रास्ता क्या है
ना फ़िक्र ये की मंज़िल क्या होगी
ख़ुशी क्या ये कम नहीं है कि
सफर में हम साथ तो हैं। ......