Wednesday, March 28, 2018

आओ सूरज उगाएं





अंधेरों से बाहर निकलने के लिए 
तलाश है हम  सबको एक सूरज की 
क्यों ना  उगाये एक सूरज हम खुद 
अपने मन के आँगन में 
करने को रोशन हर अँधेरा कोना 
छिटका कर किरणे आत्मा विश्वास की 


पर कैसे उगाये इस सूरज को 
कौन सा बीज डाले, कौन सी खाद 
अगर कुचले  स्वप्नों के खंडित  बीज डालेंगे
तो कोपल कहाँ से फूटेंगी 
बचा कर रखो कोई एक स्वप्न 
जो बो सके बीज अपने सूरज का  


और खाद बनेंगे वही सारे 
टूटे कुचले खंडित स्वप्न 
जो रोपेंगे उस एक दिव्य स्वप्न को 
बचा कर रखो आग ऊर्जा देने को 
सूरज की तेजी के लिए 
व्यर्थ कुछ नहीं है 


सींचना होगा सूखी बंजर 
मन -धरती को हर रोज़ 
रिसते रिसते  भावो से 
एक पतली  धारा पानी की जब 
कर देती सूराख पत्थर  में 
निरंतरता में बल है 

Wednesday, January 17, 2018

आवाज़


कहते हैं जिसका कोई नहीं होता उसका खुदा होता है
लेकिन ये खुदा कहाँ है ?कहाँ हो तुम भगवन ?
.
बहुत शोर है दुनिया में दुहाई और गुहारों का
क्या उसको हमारी आवाज़ सुनाई देती है
या दिल की अर्जी दब जाती है एक के नीचे एक
सरकारी फाइलों की तरह
और धूल खाती रहती है अपने नंबर के इंतज़ार मैं
जैसे फैसले और इन्साफ की राह देखते
बेमतलब ही सजा काट लेते हैं अनगिनत कैदी जेलों मैं
और बा-इज़्ज़त बरी होते हैं उम्र के उस आखिरी पड़ाव मैं
जब ज़िन्दगी दफ़न हो चुकी होती है मौत की दस्तक से पहले
.
क्या अनजान है वो लोगो की तकलीफो से
या पथरा गयीं हैं उसकी आँखें भी
अपने बनाये हुए अप्रतिम संसार के
बदलते स्वरुप , रंग से बदरंग-ए - हाल देखते
क्यों नहीं पसीजता उसका सीना
या बेदिली से बस लिखता जा रहा है
रोज़ नयी कहानियां , आधी अधूरी
वक़्त के हाथों मोहताज छोड़कर
जो बिखर जाती हैं अपने मुकम्मल अंत तक पहुँचने से पहले
.
मंजरी

Sunday, December 3, 2017

विवाहोत्सव


प्रिय नेहा और प्रतीक ,
तुम्हारा विवाहोत्सव मानो 
शीत  ऋतू में बसंत का आगमन 
वह अपूर्व दिन , जब नेहा तुम 
अप्रतिम सौंदर्य और आकर्षक 
व्यक्तित्व की मलिका 
चहकती  इठलाती कोकिला की भांति 
दुल्हन बन आ रही हो हमारे अंगना 


कहीं स्वप्निल रंगो की बहार है 
तो कहीं उमंगो की आतिशबाजी 
जगमगा रहा है इस मंडप परिसर 
का कोना कोना 
और तुम्हारे स्वागत और आगमन को 
उल्लसित और पुलकित मन से आतुर हम सब 
मन में यही मनोकामना लिए 
सुख और सौभाग्य से परिपूर्ण रहे तुम्हरा जीवन 


उठ रही हैं प्रतीक के  ह्रदय में भी 
स्वप्निल  संसार की अभिलाषाएं 
और मुखर हो रही हैं  मुख मंडल पर 
एक स्निग्ध मुस्कान के रूप में 
दिल में उमड़ते अनुराग से 
गुलाबी नगरी को और गुलाबी करती 
प्रेम और विश्वास के अटूट बंधन से बंधी
 नेहा के प्रतीक तुम्हारी युगल जोड़ी 

- मंजरी- 
२३-११-२०१७ 

Tuesday, November 28, 2017

आधे किस्से




आधे वक्त के आधे किस्से 
कब पूरे होंगे ये हिस्से


कुछ बातों के सर उग जाते 
कुछ के पैर निकल जो आते


तो अपने आप ही चलते रहते 
दिलों के बीच गुफ्तुगू के सिलसिले


Thursday, November 2, 2017

"जन्मदिवस"


( Dedicated to my dearest friend )

प्यारी बीना
तुम्हारा जन्मदिवस मानो बसन्तोत्सव
फूलों की महक से सराबोर हर आँगन 
वह अपूर्व दिन कि ऐसा लगे जैसे
होली और दिवाली दोनों गलबहियाँ डाल
चहकती इठलाती आ धमकी हो
कहीं स्वप्निल रंगो की बहार है
तो कहीं उमंगो की आतिशबाजी
जगमगा रहा है हर मंडप का परिसर
और तुम्हारे स्वागत और आगमन को
उल्लासित और पुलकित मन से
व्याकुल हम सब
नतमस्तक हो वंदन करते ईश को
तुम्हारा गौरव पूर्ण यश
सदैव कीर्तिमान रहे
और स्नेहमयी मूर्त तुम
निश्चल भाव से हर्ष पूर्वक
यूँही आयुष्मान रहो !!

Tuesday, October 10, 2017

दो राही


उफनते दरिया में बहते आये 
जाने कहाँ से 
दो अनजान राही 
कभी डूबते कभी उतराते 
विधि ना जानी


जो थामा हाथ 
मझधार मैं 
हौसले से ठानी 
अब बिना तूफानों से डरे 
गुज़रेगी ये ज़िंदगानी

Wednesday, October 4, 2017

1991 की डायरी


अलमारी को व्यवस्थित करते समय 
फिर मिल गयी तुम्हारी वो 
१९९१ की एक डायरी 
हाँ, तुम्हारी आखिरी डायरी
पर वह सिर्फ एक डायरी नहीं है
उसमे तुम्हारा पूरा अस्तित्व समाया है
.
पहले पन्ने पर लिखा तुम्हारा नाम और पता
हमारा घर , जहाँ आये थे तुम
आखिरी बार उस ताबूत में
खामोश और शिथिल
और फिर वो देह भी सामाप्त
और रह गए तुम बस इस डायरी में सिमट कर
.
बहुत से दोस्तों के नाम , पते, नंबर
और कुछ उनके लिखे पत्र
तुम्हारी मधुर दोस्ती के प्रतीक
शायद , उन्हें तुम आज याद ना हो
पर जीवंत है तुम्हारी दोस्ती
इन पत्रों में बखान स्मृतियों मैं
.
बहुत से बचपन के चित्र
स्कूल और कॉलेज के
डायरी के पन्नो में छुपे हुए
याद दिलाते बचपन के वो दिन
जो हमने गुज़ारे थे साथ
उन्ही गलियों और चौबारों मैं
.
बहुत से कोट्स और कविताएं
जो लिखी थी तुमने कभी
अपने मन के अनकहे भावों को
उकेर कर पन्नो में समोया था
आज भी महकते हैं ये पीले पन्ने
तुम्हारे अस्तित्व के स्पर्श से
.
बहुत से सफलता के परचम
छुए थे तुमने स्कूल और कॉलेज में
पढाई और स्पोर्ट्स के हर क्षेत्र में
हर रेस में सर्वदा प्रथम
ना जाने ज़िन्दगी की रेस से
क्यों आउट हो गए
.
आज फिर मैंने, इस डायरी को
अश्रुपूर्ण नेत्रों से, गले को लगाया है
और प्रेम से सहेज कर फिर से
रख दिया है अपनी अलमारी मैं
तुम साथ हो मेरे , अब भी
! हमेशा रहोगे !
.
तुम्हारी दीदी