Monday, February 29, 2016

मैं और तुम




मैं और तुम गर साथ में होते
होती क्या , हर पल तकरार

मंडी में हर सब्जी के ऊपर
क्या होती थी खींचा-तान
तुम बैगन के गुण समझाते
मैं कद्दू का मोल बताती
अंत में लाते भिन्डी- आलू
बैगन -कद्दू वही ताज आते

मैं कहती कुछ लाना है
तुम कहते नहीं जाना है
फिर तुम मुझको खुद ले जाते
मैं कहती अब क्यों जाना है ?
लड़ते-झगड़ते जाते थे
पर हँसते-हँसते आते थे

कभी प्रेम की होती फुहार
कभी मीठी-मीठी मनुहार
कभी रूठते, कभी मनाते
एक दुसरे पर झल्लाते
पर आने वाली हर मुश्किल में
डट कर साथ खड़े हो जाते

जीवन में खट्टी -मीठी बातों के
सिरे-सिरे मिल जाते थे
कुछ बातों के मतलब होते
कुछ बेमतलब के मनमुटाव
पर इस सारी नोक - झोंक में
होते कितने अच्छे पल
मैं और तुम गर साथ में होते
होती थी हर पल झंकार

मंजरी

Thursday, February 18, 2016

एकभूत



बिखर जाने दो इन हवाओं में 
की समन्वय हो जाऊं 
सृष्टि के कण कण से,
और एकभूत हो जाऊं
 परम ब्रह्म में ...... 

तुलसी




हर घर मैं एक तुलसी की ज़रुरत है 

मंजरी को तो चहुँ और बिखरना ही होगा 


रोपने को प्रेम और विश्वास का पौधा 


मंजरी को तो धरती में रमना ही होगा

Monday, January 25, 2016

बहती हवा के संग






चुरा के कुछ रंग फूलों के चुपके से
कुछ टुकड़े उन टूटे सितारों के लगा कर
फिर निकल पड़ी मैं अपनी चुनरी को सजा कर
हवा के संग बहती , बतियाती- मुस्काती
अपनी ही किसी धुन मैं मगन , मांग के चहक 
थोड़ी सी, उडते पंछियों से उधार। ...


Sunday, August 16, 2015

Complete Freedom





Let your body be free from all desires,
false pretence and artificiality.

Let your thoughts be free from egoism,
ignorance and obnoxiousity.
Let your mind be free from all fears ,
mental boundaries and discriminity.
Let your soul stir free from lethargy,
apathy and magnetism of negativity.
And then you celebrate the
COMPLETE FREEDOM
The freedom of your body,
mind and spirit.




Wednesday, July 29, 2015

कर्मभूमि


( श्री अब्दुल कलाम जी को समर्पित एक श्रद्धा सुमन )

एक  नायक आज हमसे  विदा ले चला 
छोड़  चला  अपने पीछे 
अतुलनीय  यादों का  ताना  - बाना 
कौन कर पायेगा 
इन रिक्त  स्थानो की पूर्ती 


कैसी  विचित्र लीला है संसार की 
हर आने वाले  को 
जाना  भी जरूरी  है 
ये जीवन आने  और  जाने  का 
क्या बस, एक अंतहीन सिलसिला  है 


देह  के नष्ट होने  से 
क्यों विचलित  हैं हम 
वो आत्मा जो अमर  है 
जन्म  लेके फिर  आएगी 
कहीं और, किसी नए  रूप में 


तब खड़े होंगे  नए आयाम फिर 
नयी कृतियाँ, नयी स्मृतियाँ 
फिर  स्तंभित होंगी 
जो उन पुराने सन्दर्भों को 
 नया दृष्टिकोण  देंगी 


संसार रुपी  आकाश गंगा  में 
हर आत्मा एक अग्नि पुंज है 
जो विलुप्त  होने से  पहले 
प्रज्वलित कर जाती  है 
कुछ और  नयी दीप  मालाएं 


जैसे  एक वृक्ष सूखने   से पहले 
पिरो जाता  है अनगिनत बीज 
धरती के  आँचल में 
जनम  लेने को नए  पौधें 
फिर  उसी कर्मभूमि में 


मंजरी 

Saturday, July 4, 2015

Thanks Giving



Thank you to all who did not  help and  support me 
when I needed  a  companion, 
so that I  gather courage  to do on my own.

Thank  you to all  who did not  give your hand 
to stop me from stumbling to fall , 
so that I collect  strength  to  raise  myself high .

Thank you to all who did not walk beside  me
to travel the uneven roads of  life, 
so that  I enlighten my path to walk alone.