Saturday, August 29, 2020

बाजार



क्या अजीब दुनिया है 
जहाँ कदम कदम पर 
खरीद फरोख्त का बाजार है 
यहाँ रिश्ते भी बिकते हैं
और ज़मीर भी बिकते है
यहाँ सपने भी बिकते हैं
और ज़ज़्बात भी बिकते हैं
ज़िंदा इंसानो की क्या बात करें जनाब
यहाँ तो मुर्दे भी बिकते हैं
और कब्रिस्तान की धूल भी बिकती है
.
हम प्यार की बाते करते हैं
एक औरत चारदीवारी के भीतर
उँगलियों पर दिन गिनते रह जाती है
और बहार फरेबी अदाओं के एक इशारे पर
आदमी का दिल दिमाग दोनों बिक जाते हैं
एक माँ अपने लाडले की
चीख भी नहीं सुन पाती है
और ख़बरों के बाजार में
मसाला लगा लगा कर
उसकी मौत बिक जाती है
.
ये कैसे भूख है ये कैसी प्यास है
जो सुरसा के मुंह सी बढ़ती चली जाती है
क्या पैसा क्या नाम
क्या शोहरत क्या काम
यहाँ जाहिलों की बस्ती में
कलम बिक जाती है
नंगो की महफ़िलो में
इज़्ज़त की चिलम फूंकते
कामयाबी की कुंजी खरीदने को
अस्मत बिक जाती है
.
क्या न्याय करे भगवान् अब
भोचक्का बड़ा है
उसकी बनायीं दुनिया मैं हर कोई
खुद, भगवान् बना बैठा है
कौन सच्चा और कौन झूठा
कौन अच्छा और कौन बुरा
तराजू की पेंदी में छेद बहुत हैं
फैसला करेगा कौन जब
मुजरिमो के हाथों मैं
इन्साफ बिका बैठा है
------
---मंजरी
27th Aug 2020

" नामुकम्मल "



"बहुत खूबियां होंगी मगर 
 मैं अपने ऐबों पर नज़र रखता हूँ 
होंगे कई पसंद करने वाले मगर 
 ठुकरा देने वालों का शुक्रिया अदा करता हूँ " .
.
 लाख खूबसूरत हुआ करे चाँद 
 एक धब्बा उसमे भी है 
 सर झुका चलने के लिए 
 मुकम्मल कुछ नहीं होता 
 कोई कमी बेशी होने दो यारो 
 बेहतर बनाने की गुंजाईश तो है .

कहीं ज़मीन है तो छत टूटी है 
 शुक्र मनाओ आसमान साफ़ है 
 तभी तो सितारों का नज़ारा है 
कहीं मीलों लम्बे रास्ते हैं 
 मंज़िल का नामो निशाँ नहीं है 
 शुक्र मनाओ पाँव आज़ाद तो हैं 

कौन कहता है सबको 
 सब कुछ मिल जाता है 
 कोई न कोई कमी से 
 हर दामन खाली नज़र आता है
 हो सके तो जला दो एक चिराग 
 मन का अँधेरा बहुत सालता है . 

ना जाने कौन अपना है कौन पराया 
 ये रिश्तों की गांठों मैं उलझने से बेहतर 
 चलने दो सबको साथ साथ 
 जीवन है तो काफिले हैं 
 वरना मौत के साथ तो एक दिन 
 अकेले ही चले जाना है 

 ----- Manjri .../ 13th July 2020

Saturday, May 23, 2020

अटल जिजीविषा


खिल जाते हैं गुलशाद पत्थरो में भी 
कुछ बीजों को तूफ़ान ही सैर कराते हैं 
दब कर किसी खंदक के पसीजे दिल में 
बे इरादन ही अंकुर पनप जाते हैं
अजीब करिश्मा है कुदरत का
प्रचंड सूरज की अग्नि से जहाँ
सारी वनस्पति मुंह लटका लेती हैं
ये ढीठ जाने कैसे आयुष पाते हैं
बवंडर के आवेश में हिचकोले खाते
लम्बे चौड़े दरख़्त भी धराशायी हो जाते हैं
पर बिना किसी ठौर -सहारे के भी
ये निर्लज ऐसे में भी मुस्काते हैं
हिल नहीं पाती है इनकी अटल जिजीविषा
नख शिख तक पानी मैं डूब डूब कर
नाग फनी उठा फिर तन जाते हैं
काँटों की खलिश से रक्त रंजित
अपने ही लहू से निखर जाते हैं
इनका कोई क्या बिगाड़ेगा
ये तो पैरो तले रुंद कर भी
एक से हज़ार हो जाते हैं 

Monday, December 9, 2019

छोटे-छोटे पाँव





मखमली चादर मैं लिपटी, सोई कामिनी
उसके बच्चों की माँ और अर्धांगिनी
उत्कर्ष पद, गरिमामय वयक्तित्व 
समृद्ध परिवार , पारिवारिक अपनत्व
क्या कुछ नहीं है, पर ना जाने क्यों
एक कमी सी है, कोई तलाश है
ज़िन्दगी के पन्नो को उल्टा फड़फड़ाकर
विचारों पर जमी धूल को उड़ाकर
अतीत के कुँए मैं कूद पड़ा
यादों की बंद संदूकचियों मैं से
जाने किस मोती की तलाश मैं
.
दिसंबर की सर्द रातें और रेहड़ी पर की चाय
दोस्तों के साथ मटरगश्ती वाली ज़िन्दगी बेपरवाह
उफ़फ ! क्या दिन थे वो भी
बेखौफ जवानी के घमंड मैं झूमते
मस्ताने हाथियों के झुण्ड
कॉलेज की रंग बिरंगी तितलियाँ
मचलते भवरों का दिल
छतों की मुंडेर के आर पार
आँखों आँखों का वार
वो, सीमा थी,उसका एकतरफा प्यार
क्या वो कसक आज भी बाकी है ?
.
माँ की स्नेहभरी झांकी और बाबूजी की झिड़की
बालपन की नादानियाँ ,छोटी छोटी अभिलाषा
पतंग, कंचे, कागज़ की नाव
गुलेल से तोड़ते बेर और आम
नीम के पेड़ पर चढ़ अंडे की चोरी
मंडराते कौवों की कर्कश काँव - काँव
मास्टर जी की स्केल से पिटाई
साईकिल से पूरे शहर की घुमाई
वो जरा जरा सी बातों पर
कभी झगड़ा कभी खिलखिलाना
क्या वो हँसी कहीं खो गयी है ?
.
गहन तन्द्रा से जैसे होश मैं आया
प्रगति की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते
ज़मीन से कोसो दूर हो गया था
बाहें तो आसमान मैं फैला ली
पर धरती कहीं धसक गयी थी
आखिरी बार बच्चों के साथ
कब बैठा था याद नहीं
कामिनी के दिल की थाह ??
नहीं, अभी भी देर नहीं हुयी
आत्म मंथन से मिला संतुष्टि का राज
सच्चे सुख के छोटे-छोटे पाँव
.
--मंजरी
8th December 2019

Sunday, December 1, 2019

उसने कहा था


उसने कहा था 
"प्रेम अगर सच्चा होता है तो विचलित नहीं होता "
ना जाने कौन सी घुट्टी पिला गया वो फ़कीर
कि मन प्रेम की कसौटी को चुनौती देने 
दिमाग के गुलंबर पर चढ़ जा बैठा 
अड़ियल घोडा आज भी 
गुलंबर के मुहाने से मुंह निकाले 
झांकता रहता है टिकटिकी लगाए
उसकी बात पर अमल करता 
आते जाते राहगीरों के 
पैरों से उड़ती धूल फांकता 
गुरु दक्षिणा देने के इंतज़ार मैं 
.
उसने कहा था 
"पास आ कर मेरा दुःख दर्द बांटने वाले
मुझसे कतरा के गुज़रना तो अभी बाकी है"

ना जाने कौन सा टोटका लगा गया वो फ़कीर 
कि कदम जड़ हो गए उसी जगह 
अहिल्या के तरपन को राम आते हैं
ना जाने कितने वर्षों तक मूर्त अवस्था मैं 
एक जगह स्थापित,पथराई आँखों से 
उस शापित अहिल्या को राह देखनी होगी
जब राम खुद आएंगे भ्रमण करते 
और फिर जीवित होगी 
वो अहिल्या राम के स्पर्श से
.
- Manjri- 30th November 2019

Friday, August 23, 2019

मुर्दे

शुष्क होठों की पपडियां 
बयान करती हैं वो अनकहे किस्से 
जो परत दर परत जम गए 
भिंचे अधरों की संद मैं
कसमसाते हैं कभी
खुली हवा मैं सांस लेने के लिए
त्रिशंकु की अवस्था मैं
कंठ में अटके बोल
टूटे पखों का दर्द लिए
कराहते हैं मुठी मैं बंधे ख्वाब
जकड़े उँगलियों की काल कोठरी मैं
उम्र कैद की सजा काटते
क्या गुनाह था इनका
जो अजन्मे शिशु की तरह
गर्भ मैं ही कर दिए गए
क्षत विक्षत , निष्प्राण
हृदय मैं जन्मे प्रेमांकुर को
छल कपट के फंदे ने
चिर निद्रा मैं सुला दिया
अपनी जननी के आँचल मैं
.
बेमौसमी बरसात के छींटों से
कब्रगाह की मिटटी में दबे
ज़ज़्बात कभी कभार सील उठते हैं
पर मुर्दे फिर नहीं जिया करते हैं 


मंजरी

Sunday, June 2, 2019

ज़िन्दगी की गाड़ी




हमारी ज़िन्दगी की गाड़ी भी इन्ही दौड़ती  भागती 
दुपहिए , चोपहिये वाहनों सी नहीं है क्या ?

कोई भाग रहा है सरपट , एक्सप्रेस ट्रैन की विद्युत गति से 
बिना किसी रूकावट , पूरे नियंत्रण के साथ 
नपे तुले पड़ावों पर विश्राम करते, उत्साह और स्फूर्ति के साथ 
निर्धारित समय पर  गर्व  से मंज़िल पर  जा पहुँच 
कोई चल रहा पैसेंजर मेल की घिसट घिसट  चाल 
जिसे हर  चढ़ता  मुसाफिर चैन खींच रोक देता हो 
बुझे मन से,उसे पीछे छोड़ आगे निकलती गाड़ी को देखती ,
डाह से  जल-जल कोयले की राख का धुआं उड़ाती 

कुछ ज़िंदगियाँ मानो सड़को पर ठसाठस भरी रोडवेज की बस 
जो मजबूरियों के बोझ से आधी झुक चुकी है 
छलनी सीने के टायर की फिसफिस हंसी  
जो हर मोड़ की कील से पंचर हुआ हो और जिसे 
एक छोटे से गड्ढे से असुंतलित हो उलट जाने का भय हो 
वो कैसे मुकाबला करे उन वातनुकूलित परियों से 
जो हवा से बाते करती , सपनो की दुनिया सी रंगीन
एक निश्चित लक्ष्य की और अग्रसर है 

किसी का आसान है इतना सफर 
 कि बस दिशा निर्देश देते हुए चल रही  उनकी गाड़ी है
सिर्फ एक जुबां का इशारा  और सर झुकाता दरबान है  
गंतव्य तय, रास्ता तय , हमसफ़र तय और विजयश्री भी तय 
और कोई कर रहा है जोड़ तोड़ हर साँस के आवागमन की  
ना ठौर ना ठिकाना ,ना  भूत ना भविष्य, बस आज की चिंता मैं मग्न 
दो रोटी की जुगाड़ और मुठ्ठी भर चैन की तलाश मैं  भटकता 
सुबह से शाम कोल्हू के बैल सा ज़िन्दगी के पहिये को खींचता 

---
मंजरी- 1 st  June  2019 

Thursday, May 2, 2019

चुनावी बुखार






चुनावी बुखार है , नेताओं की बहार है 
कोई मौसमी बरसात की गीली लकड़ी पर उगे 
एक दूसरे के फन को दबाते कुकुरमुत्तों की तरह 
कोई सदियों पुराने पीपल के पेड़ पर चढ़े
अमावस की रात के भूतों की तरह
चार दिन की चांदनी है,
फिर अँधेरी रात में नाचते चोरों की बारात है।
.
जीतने की गुहार है सब कमर कस तैयार हैं
कोई, यहाँ भी नकल मार, अंग्रेजी भाषण दे
इतराता है ,चाहे खुद अंगूठा छाप है
कोई भाड़े के टट्टुओं से मैदान में
भीड़ लगता है, आखिर चकाचोंध का व्यापार है
कुछ दिन की माथापच्ची है,
फिर पुश्त दर पुश्त चलने वाला भण्डार है।
.
बस एक यही तो मौका है , फिर चौका और छक्का है
कोई पुराने पापो को रिश्वत के हैंडपम्प से धो कर चला है
उसका तौलिया अभी भी किसी गरीब के खून से गीला है
कोई मैली सोच की आस्तीन को नोटों के जैकेट से ढका है
बाप दादाओं की शान का सिक्का, आज फिर चल पड़ा है
चुनावी दंगल का मैदान है,
देशप्रेम की लंगोटी पहने यहाँ सब नंगे -भिकमंगे हैं।
.
एक कुर्सी की बस चार टाँगे हैं और हज़ारों उमीदवार हैं
कोई, झूठे वादों की बैसाखी लिए सीना तान खड़ा है
बेखबर , टाँगे खींचने वाला, उसके ही पीछे खड़ा है
कोई दिखावे की सेवा को हाथ जोड़ गिड़गिड़ा रहा है
देखो, इन्ही दस्तानो के नीचे मेवा का कटोरा दबा है
गर्भस्त अभिमन्यु जैसी पहेली है,
अँधेरे मैं तीर चला जनता को भेदनी है।

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29 April 2019

Tuesday, April 16, 2019

वो दिन


जाने कहाँ गए वो दिन
जब संयुक्त परिवार मैं सब मिलकर रहा करते थे 
कभी देवर भाभी से चुहल - मनुहार किया करते थे
कोई चाचा , कोई बुआ, कोई बाबा दादी हुआ करते थे
ख़त्म हो चले वो सारे रिश्ते जो कभी अपने हुआ करते थे
एक थाली मैं बैठ कर खाते एक रोटी के चार टुकड़े हुआ करते थे
तब घर छोटे और दिल बड़े हुआ करते थे
जाने कहाँ गए वो दिन
जब गलियों और मोहल्लों मैं जमघट हुआ करते थे
कोई त्यौहार कोई हो काम सब सांझे हुआ करते थे
एक दुसरे के सुख दुःख में पडोसी भी भागी हुआ करते थे
लुप्त हो चला वो चाल चलन जो दीवारों को जोड़े रखता था
एक घर से दूसरे घर तक छतों छतों जा सकते थे
तब दिलों के साथ साथ घरों के दरवाजे भी खुले रहा करते थे
जाने कहाँ गए वो दिन
जब एक दोने की बर्फी मैं सब मुँह मीठा कर लेते थे
एक का बल्ला, एक की गेंद, कुछ तेरा मेरा नहीं होता था
एक दोस्त की बहन सबकी ही बहन हुआ करती थी
बिखर गए वो संगी साथी जो बचपन में खेला करते थे
एक दूजे की खातिर जो, ख़ुशी से झुक जाया करते थे
तब रिश्ते बड़े और नाक छोटी हुआ करती थी
--
मंजरी - 16th april

Saturday, January 19, 2019

मन की कचहरी




एक दिन मेरे मन की कचहरी में 
एक बड़ा पेचीदा मुकदमा आया 
एक तरफ दिल और दूजी तरफ दिमाग 
दोनों मैं से एक भी ना पीछे हटने को तैयार 

दिमाग कहे कि दिल मे नहीं है जरा भी सब्र 
बिना सोचे समझे ले लेता है 
जल्दी बाजी मैं फैसले 
और फिर कर देता है उसकी  नींद हराम 
दिल कहे कि  दिमाग बहोत है कठोर 
रिश्तों के नाज़ुक मसलों पर 
घंटो  तक सोच विचार करने से 
उसका  ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है 
कौन  सही और कौन गलत 
इसका फैसला कैसे हो 
बिना दलील और गवाह के 
कोई भी निर्णय उचित नहीं 

दिल का नंबर जैसे  आया 
उसने पहला वाकया  बताया 
अभी परसों की बात थी 
पडोसी का लड़का मुस्कुरा के 
लॉन्ग ड्राइव पर ले जा रहा था 
दिमाग ने बीच मैं टांग अड़ा दी 
अच्छा -बुरा, सोच सोच के 
मेरा पत्ता साफ़ हो गया 
उसकी सीट पर दूसरी लड़की 
कार मैं दिल्ली घूम रही थी 
मेरी लव स्टोरी शुरू होने से पहले 
उसका दी एन्ड हो गया 

दिमाग तैश में आकर बोला 
देखो पागल दिल की बातें
वो लड़का दिल फेंक  है आशिक 
रोज़  नयी चिड़िया को फांसता 
जान बूझ कर अनदेखा कर 
दिल जज़्बातों मैं बह जाता 
जल्दी मैं हां करने से 
मेरा काम भी बढ़ जाता
कभी  नज़र रखो,कभी करो जासूसी 
कहीं टूट गया दिल फिर क्या होता
इसके रोने को सुन सुन कर 
मेरे सर मैं होता दर्द 

बात सही थी दोनों की 
पर दिमाग ने की थी समझदारी 
अभी अधूरा था न्याय 
अब अगले मुवक्किल की थी बारी 

अगला किस्सा दिमाग ने लाया
देखो दिल की बेवकूफी 
सर पर लोन मकान का है 
और लाख  मना करने पर भी
चल बैठे बन श्रवण कुमार  
माँ पिताजी को भारत भ्रमण कराने 
और कर्ज की किश्ते बोझ बना कर 
दुगनी मुझ पर हावी कर दी 
क्या हो जाता रुक जाता गर 
अगले साल तक टल जाता 
तब तक हो सकता है शायद 
कुछ और इंतजाम हो जाता 

दिमाग की शातिरता पर दिल को 
बड़े ज़ोर से आया गुस्सा 
तू बात क़र्ज़ की करता है 
माँ बाप हमारे लिए जीवन भर 
कितना पल पल करते हैं 
उनकी एक ख़ुशी की खातिर 
ये क़र्ज़ की याद दिला मत मुझको 
जैसे अब तक हुआ सभी कुछ 
दुआ रही अपनों की मुझ पर 
ये बोझ भी जल्द उतर जाएगा 
उनकी इच्छा  पूरी करने पर 
मुझ में एक संतोष आ गया 

शयद अबकी मुझे दिल सही लगा 
दोनों के अपने मत है 
कितना मुश्किल है इनके बीच
सही निर्णय का ले पाना 
मैंने एक रास्ता अपनाया 
बात ऐसी है दिल और दिमाग 
तुम छोड़ो ये कोरट कचहरी 
दोनों मिल कर आपस मैं 
आउट ऑफ़ कोर्ट सुलह कर लो
सुनो जरूर इस दिल की  बात 
पर दिमाग की बात अनसुनी कर के 
करना नहीं कोई भी बड़ा काम 
... 
मंजरी - 19 jan 2019 

काल चक्र



सूखे पत्ते की खड़खड़  
मानो पतझड़ का हो गान कोई 
मत मान करो, अभिमान हरो 
वक्त बदलते झड़ जाएगा 
उजड़ी डाल  पे बैठा  पंछी 
शंका से भर जाएगा
ले कर अपने नन्ने मुन्ने 
रैन बसेरा, उड़ जाएगा 

यह सीख भली है पतझड़ की 
गर जान ले जो  इंसान कोई 
घर का मुखिया , सिरमौर बड़ा 
बांधे सबको एक कड़ी 
स्नेह आशीष रखे छोटों पर 
दंभ -  क्रोध से उपजे बैर 
कर्म तुम्हारे आरी बन कर 
काट ना दे रिश्तों की डोर 

ये जो फेरहिस्त है मौसम की 
बस काल चक्र है सृष्टि का 
जो औरों को तुम देते हो 
वह वापस तुम ही पाओगे 
चाहे विधि अलग हो, भान जुदा 
है स्वर्ग यहीं, है नर्क यहीं 
मन की गठरी हलकी रखना 
बोझ तुम्हारे सर आएगा 

विचित्र बड़ा है नियम प्रभु का 
हर बात के लेखे जोखे हैं 
तुम देख रहे हो आज का जीवन 
बीते कल को भूल भले जा 
पिछली  गलती की सजा 
अगली पीढ़ी तक जाएगी
जो समय के रहते संभल गए तो 
क्षमा -याचना मिल जायेगी 

======
मंजरी-  18 jan 2019 

Tuesday, January 1, 2019

नया साल


ये साल जाएगा और नया साल आएगा
पर सच कहो तो भला क्या बदल जाएगा ?
.
एक तरफ कड़ाके की ठण्ड मैं सिकुड़्ता
छेद वाले पैबंद लगे झीने कुर्ते से
हड्डियों के ढाँचे को बमुश्किल ढंकता
सड़क के किनारे बर्फीली हवा से
जलते बुझते अलाव के धुंए में
आँखें मिचमिचाता, दाँत किटकिटाता
कैलेंडर में तारीखें बदलने से अनजान
कुत्ते को सिरहाने बना ,गुड़मुड़ी गठरी बना
एक दूसरे के बदन को गर्मी देते
फुटपाथ पर , दो मुफ़लिस
जान बचाते, रात गुज़ारते
क्या ये अलाव सुबह होने तक
इनका साथ दे पायेगा ?
.
दूसरी तरफ हाथों में हाथ डाले
आला दर्जे के होटलों और रिसॉर्ट्स में
तेज म्यूजिक पर थिरकते
एक दुसरे से अनजान एक रात के साझेदार
शराब के फव्वारे में नहाते
नाना प्रकार के व्यंजनों के ढेरो पर
नुक्ताचीनी कसते ,चख चख कर फेंकते
नए साल के आगमन का जश्न मनाते
और बची हुयी जूठन को
रसोईघर के पिछवाड़े से उठाकर
गपागप ठूंसते भिखमंगे बच्चे
क्या ऐसा खाना उन्हें हर रोज़
नसीब हो पायेगा ?
.
और तीसरी तरफ, देश की सीमा पर
माइनस तीस डिग्री के टेम्प्रेचर को
दरकिनार रख, सभी अपनों से दूर
हम सबकी हिफाज़त के लिए
रोज़ दर रोज़, अपनी जान की
परवाह किये बिना
गुमनामी के अंधेरों से जूझते
ग़म और ख़ुशी की सौगात से परे
रात भर आँखें फाड़े चौकस
मुस्तैदी से पेहरादरी करते
देश के बहादुर सिपाही
क्या उनको इन कुर्बानियों का
सिला मिल पायेगा ?
.
मंजरी

Wednesday, December 26, 2018

विरोधाभास




किसी विवाह का निमंत्रण पत्र देखकर
कभी जो मन आनंदित हुआ करता था
वही मुस्कान आज सहमी - सहमी 
पल भर मैं क्षीण क्यों हो जाती है
आशाओं और सपनो की जगह
आशंका और अविश्वास ने कैसे ले ली
क्या रिश्तों की गर्माहट
अब हाथ जलाने लगी है
या उम्र भर साथ निभाने वाले सम्बन्ध
अब दौलत के तराजू मैं तुलकर
बिना गारंटी कार्ड के आने लगे हैं
अपनों की जरूरत होते हुए भी
हुम रिश्तों से दूर भागने क्यों लगे हैं
आखिर ये विरोधाभास क्यों है ?
.
यदा कदा होने वाली शोक सभाएँ
कभी जो मन को उद्वेलित कर देती थी
आज इश्तिहारों की तरह अखबारों के
कई पन्नो पर छपने लगी हैं
मृत्यु तो अटल और शास्वत सत्य है
पर ये इतनी सस्ती और आम कैसे हो गयी
क्या किसी जीवन का अंत
अब हमे विचलित नहीं करता
या गूंगे बहरे बने, मुंह पे ताला लगाए
मतलब परस्ती के नाच मैं मगन
खून को पानी मैं बदलते जा रहे हैं
मौत की आवा जाही को कोसते हुए भी
अपनी आत्मा को खुद मारने क्यों लगे हैं ?
आखिर ये विरोधाभास क्यों है ?
.
बीते ज़माने की अमूल्य यादे
कभी जो मन को गुदगुदाया करती थीं
आज साबुन के बुलबलों की तरह
हवा मैं विलीन क्यों हो जाती हैं
वो चूल्हे की रोटी और अम्मा का दुलार
बस एल्बम के पन्नो में दुबक कर क्यों रह गया
क्या चाँद पर पहुँचने की ललक
हमे धरती से दूर ले जा रही है
या आधुनिकता का चश्मा चढ़ाये
संस्कृति को बांदी बना
हम भौतिकतावाद के नशे में डूबते जा रहे हैं
जड़ों की अहमियत को जानते हुए भी
कुल्हाड़ी से अपने ही पैर काटने क्यों लगे हैं ?
आखिर ये विरोधाभास क्यों है ?

Saturday, December 15, 2018

टूटे पत्ते की सार्थकता


अलग हो चुके कोई पत्ता जब
किसी डाली से टूट कर 
नहीं जुड़ सकता फिर दुबारा
किसी शाख या किसी दरख़्त पर
उड़ता फिरता है बदहवास,कभी
बिना किसी ठौर-ठिकाने के
हवा के थपेड़ो संग ,बेजान
किसी भी सूरत -ए - हाल
कराह उठता है कभी कुचल कर
उन्ही पैरों तले रुंद कर
जिनके सर कभी छत्र बना था
सूरज पर सीना तान
समय का चक्र भी गज़ब अनोखा
कब ठहरा है वह एक समान
जो ऊपर है वो नीचे होगा
कर निचले वाले का उत्थान
सृष्टि का जो नियम बना है
कौन उसके जा सके विपरीत
नहीं व्यर्थ यहाँ है कुछ भी
सूखे पत्ते का तब, क्या है काम ?
ढूंढने होंगे फिर नए आयाम
सूखे पत्ते को अपने लिए
कोई उपयोगिता, कोई रूपांतरण
जो सार्थक करे, शेष जीवनकाल
क्या बिछ कर धरा पर रोक ले ?
उसके कलेजे की नमी
ना सूख पाएगी धरती की छाती
प्रचंड सूरज की तपिश से
या बन जाए सतह, बिंध कर
एक नए नीड़ की नींव में
किसी पंछी के बसेरे को
थाम कर अपने आगोश मैं
और कुछ नहीं, तो हो रेशा -रेशा
खाद बन, मिल जाए माटी मैं
जिसमे से रूप बदलकर फिर फूटेगी
एक नयी कोपल, नवजीवन के साथ !!

Friday, November 30, 2018

मूक ख़ुशी



रात के धुंधलके मैं ,एक वो और एक मैं
तनहा तनहा से गुम अपने अपने ख़यालों मैं
मैं सड़क के इस पार नीम के पेड़ के नीचे 
घर के बाहर पत्थर की काली बेंच पर बैठी
वो सड़क के उस पार लैंप पोस्ट के नीचे
झाड़ियों के पास चुपचाप खड़ा
कभी उसकी नज़र मुझ पर उठती
कभी मेरी निगाह उस तक जाती
एक दूसरे को देखते दो अनजाने
.
शायद उसे इंतज़ार था की मैं उसे बुलाऊँ
मेरा ये अभिप्राय की वो खुद ही आ जाए
मलिन सा मुख लिए आँख बंद कर
थक कर बैठ गया वहीं अपने हाथों मैं
अपना चेहरा समेट कर
उसके खामोश, अनकहे दर्द से उपजी
द्रवित ह्रदय की रिमझिम फुहार
मेरे मानस पटल की आंधी को
पल मैं उड़ा कर ले गयी
.
अचानक मैं दौड़ कर अंदर गयी
और झट से बाहर आयी
मेरी बंद मुठ्ठी को कौतहूल से देखता
आशा भरी नजरे से मुझे निहारता
मैंने जैसे ही उसे देख के मुस्कुराया
वो अपने आप ही दौड़ा दौड़ा आया
प्रेम को शब्दों की जरूरत नहीं होती
मेरे स्नेह के जवाब मैं उसकी मूक ख़ुशी
रोटी खाते हुए, उसकी जोर जोर से हिलती
पूँछ दे रही थी।  

Tuesday, October 30, 2018

छोटी सी दुआ



एक छोटी सी दुआ भेजने के लिए 
खड़ी हूँ आतुर, हथेली से दिल को बांधे 
किसी जाने वाले दूत की राह तकते 
लेकिन बेढब हैं आज हवाओं के रुख
निष्ठुर, बेखौफ , विपरीत दिशा मैं
चल पड़ी , मेरी विनती की अवहेलना कर
कोई पंछी, कोई बादल , कहाँ हैं सब
क्यों आज किसी तक मेरी ह्रदय की थाप
मन की पीड़ा नहीं पहुँच रही
मेरे संगी साथी ,हर बात के भागी
मौन खड़े हैं ये पेड़, ये पौधे
क्यों आज मुझे कोई सांत्वना नहीं देते
रात के पहर आज साया भी विभाजित
हो कर चल रहा, मेरे दोनों तरफ
अविश्वसनीय ! मेरे ही दो साये
क्या कहना चाहते हैं मुझसे
शायद आज चित्त , देह से अलग
भाग रहा मनचाही दिशा मैं
एक साया मेरे मर्यादा मैं लिपटे
उठते - रुकते पैरों का है
और दूजा व्याकुल मन के
अनियंत्रित आवेशों का है
भोर के तारे , तू ही जल्दी निकल
ये रात बहुत गहन हो चली है
गोधूलि मैं निकलेगा कोई पथिक
तो भेजूंगी ये छोटी सी दुआ
मन की गठरी मैं बाँध
थोड़ी सी आशा, थोड़े से सपने
एक जरूरतमंद मुसाफिर के लिए

Moon 'O' Moon



Moon 'O' Moon
How many faces do you have ?
.
One for that yearning mother
who symbolizes you to 

the apple of her eye
mount to go high meeting the horizon
shining in the sky , time yet to come
fulfilling her aspirations and dreams
You are the flaring vision of future.
.
Moon 'O' Moon
For the beloved round the world
you are the icon of endearment
gazing at you diappears the miles
and portrayed before them
the face of their soulmates
casting the spell of ecstacy
You are the heart -throb of lovers.
.
Moon 'O' Moon
The wife of that brave soldier
standing lonely on her terrace
pleading with puffy eyes
to safeguard the one
who stood as savior of hundreds
confronting enemies on the borders
You are the array of hope for thy lady.
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Moon 'O'Moon
For an isolated couple living in despair
Whose son deceased long ago
They give themselves a sigh
And smile meekly at you
expressing their abundant love
left unshowered from their heart
You are the living abode of a lost soul.
.
Moon'O'Moon
How many faces do you have ? 

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Wednesday, September 19, 2018

इंटरनेट की दुनिया


ये रंगमंच की दुनिया है, यह हमारा घर नहीं है.....
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यहाँ हर किरदार एक बेहतरीन कलाकार है
कुछ कच्चे, कुछ अपने फन मैं माहिर हैं
साज-ओ-सज्जा के मुखोटों के भीतर
जाने कितने अजीब - ओ - गरीब चेहरे हैं
क्यूंकि , ये रंगमंच की दुनिया है
यह हमारा घर नहीं है।
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यहाँ की दुनिया बड़ी सलोनी है
कहीं इंद्रधनुषी सपनो का संसार है
तो कहीं जादू की छड़ी से निकले
लुभावने , मखमली एहसास हैं
पर , ये रंगमच की दुनिया है
यह हमारा घर नहीं है।
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यहाँ कृत्रिम माहौल को अनुकूल बना
माया नगरी का फैला मकड़ जाल है
यहाँ ना पहरेदार हैं, ना कुण्डी- ताला है
सौदागरों के भेष में चोरो का बोलबाला है
बाबू , ये रंगमंच की दुनिया है
यह हमारा घर नहीं है।
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किरदारों के बोल, और उनके हाव भाव
लैला - मजनू , सस्सी - पुन्नू के किस्से
यहां चाणकय भी हैं, यहाँ शकुनि भी हैं
और सबका वजूद बस पर्दा गिरने तक है
ध्यान रहे, ये रंगमंच की दुनिया है
यह हमारा घर नहीं है।
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यहाँ का आना, यहाँ से जाना
मनोरंजन तक सीमीत रखना
असल मान कर दरी बिछा कर
यहाँ रच बस के मत रह जाना
ये सिर्फ, रंगमंच की दुनिया है
यह हमारा घर नहीं है।
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Tuesday, September 11, 2018

मैं एक नदी हूँ




मैं एक नदी हूँ बिना किनारे
निरन्तर बहना ही है मेरी प्रकर्ति
मत करना कोशिश ,लग मुझे बाँधने 
ना रह पाउंगी सिमट ,मैं एक घाट पर
है कर्म मेरा बस चलते रहना
पत्थरो के बीच , कंदराओं से होकर
उबाख खाबड़ रास्तों की मदमस्त नृत्यांगना
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मैं एक नदी हूँ बिना किनारे
नहीं एक जगह है मेरा ठौर ठिकाना
थिरकत पाँव ,चंचल प्रवर्ती
फैली हुयी ये वृस्तृत बाहें
रच बसने को कण कण मैं
फूट रहे हैं मधुकर चश्मे
अंतरघट के प्रांगण से
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मैं एक नदी हूँ बिना किनारे
जल प्रवाह का वेग समूचित
मिलता रहे गर,यूँही प्रतिदिन
हो जाउंगी एक रोज़ समाहित, सागर मैं
नहीं तो, संगृहीत हो अपने ही परिवेश मैं
सरोवर मैं परिवर्तित हो ,सूखी धरणी
मुरझे प्रसून , कुम्हले चेहरे हरषाऊँगी
.
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मैं एक नदी हूँ बिना किनारे
बसते मुझमे कितने प्राण
सबके जीवन की अभिलाषा
प्रेम सुधा सोपान लिए
बरसत हूँ मेघा बनकर
मेरे जीवन का अभिप्राय यही है
नियति यही है ,पन्थ यही है
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मैं एक नदी हूँ ..बिना किनारे। 

Wednesday, June 27, 2018

मात - पिता



(माता पिता को समिर्पत उनकी शादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर- )

माता और पिता की जोड़ी 
ईश्वर ने क्या खूब गढ़ी 
.
पिता अगर हैं गगन विशाल
माँ धरती का वृस्तृत भाल
दोनों के संयुक्त करो से
हो शिशुओं का पालनहार
.
पिता हिमालय के शीर्ष शिखर
जिसे देख मन गर्वित हो
देवतुल्य राज इंद्र के जैसे
स्नेह की निस दिन वर्षा हो
.
चट्टान स्वरूपी ह्रदय कोमला
माँ निर्मल सोपान की धारा
हो कितनी भी राह विषम
दृढ़ता की जीवंत परिभाषा
.
भण्डार ज्ञान का मिला पिता से
माँ से संस्कृति की पहचान
धीरज, संयम मिला पिता से
माँ से शक्ति, स्वाभिमान
.
आकाश पटल को छूने को
विश्वास स्तम्भ दिए पिता ने
डगमग - डगमग पॉँव हुए तो
माँ ने अनुभवी पंख दिए
.
सर पर छत्र पिता का है
तो नरम बिछोना माँ का आँचल
नमन करूँ मैं मात पिता को
वरद हस्त रहे उनका सर पर