Tuesday, July 2, 2013

यादों की लकीरें



बूढी   हो  चुकी  हूँ  मैं  अब 

हर  कोई  अपनी - अपनी  दिनचर्या 
मैं व्यस्त  और  बदहवास  सा 
भागा    चला   जा   रहा  है   
पर  मुझे  चार  कदम 
चलने  के  लिए  भी 
कोई   बहाना  नहीं  मिलता 
फिर  भी  हर  संध्या  को 
आकर  बैठ  जाती  हूँ 
घर  के सामने  बने 
खाली बागीचे के कोने  मैं  पड़ी 
अकेली  बेंच  पर 
कोई  आता   नहीं  यहाँ  अब 
बच्चों  को  फूल पत्तो से ज्यादा 
मशीनी  उपकरणों  से प्यार है 
युगल  जोड़ों  को  झुरमुट मैं 
सपने  बुनने  से  ज्यादा 
भीड़  मैं खुद  को तलाशने 
की  प्यास  है  


कुछ  देर  आँख  बंद  करते ही 

मन  की  ठेलागाड़ी  पंख  लगा 
पीछे  की ओर  दौड़  पड़ी
सलोने  बचपन  के  अल्हड 
से  किस्से  और  उनमे  छुपी 
खट्टी -  मीठी  यादें 
वो तितलियों के पंखों मैं  सिमटी 
रंगीन  कलाकृतियाँ 
पेड़ों के सायों मैं  छुपना  - छुपाना 
वो सहेलियों  संग बेफिजूल सी बातों
 पर घंटो चहचहाना 
वो  पेड़ों पे पड़ते सावन के झूले 
और हाथों से उडती मेहँदी की  खुशबू 
वो  नानी के किस्से और दादी की झिडकी
आईने  मैं झांकते अपने ही अक्स मैं 
अनायास ही किसी अजनबी के 
साए की जुम्बिश 
वो सिन्दूरी   सपनो से  महकी  सी सासें 
और  पल भर मैं जुड़ते सदियों  के नाते 



सब कुछ  एक तस्वीर  की तरह स्थिर 

जैसे जादू की नगरी के सोते हुए लम्हे 
बस छूने से  सजीव हो उठेंगे 
फिर से  वही खिलखिलाते पल 
पर समय  की काली चादर  तले 
सब  ढँका हुआ  है 
और मैं इस  गर्द भरी मटमैली चादर 
पर उँगलियों से  लकीरें  खींचती 
इस उम्मीद मैं की जाग  उठे 
कोई सोती कहानी 
किसी रेखा मैं उभरकर 
बस चला आ रहा  है ये सिलसिला 
मेरे  और समय के बीच 
मैं हर  रोज़  उकेरती 
गर्द पर यादों की लकीरें 
और हर रोज़ धूमिल करती 
समय की उडती   रेत  उन्हें 


बरसों  से चल   रही   इस  जुगलबंदी 

के साथी मैं और समय  की  गर्द 
पार  हार  कहाँ  मानी  है  हमने 
चलो  कल  फिर  आउंगी  इसी  जगह 
कुछ    नयी  लकीरें  खींचने 
जिनसे  झांकेंगी  यादों   की   परछाईयाँ 
आँखें खोल  कर  बाहर  आई 
अपने अन्दर  की  दुनिया  से 
लौट  पड़ी  फिर समय से
कल आने  का वादा करके 
अपने   उसी  पत्थर के परकोटे मैं 
जिसकी दीवार पर टंगे कैलेंडर मैं 
लिखा है मेरी  चलती साँसों का हिसाब 
या तो  मैं  जीतूंगी  या जीतेगी 
ये समय की  कालिख 
पर उससे  पहले  लिख जाउंगी 
हर याद  की कोई  अमिट कहानी 

Wednesday, June 19, 2013

रुई....के.....फाहे




आकाश  मैं  उड़ते  सफ़ेद  रुई  के फाहे 
छूट  भागे  थे  किसी किसान  के खेत  से 
एक  दूसरे  से  आगे  निकलने  की होड़  मैं 
घेरते  आकाश  को सरहद  पर सैनिक  से 
कभी थमते , कभी  हंसी ठिठोली  करते 
अनोखे और अदभुत   आकारों  को लेते 
कभी दुनिया के देशों के नक्शों का बाना 
या  मुर्गी के  चूजों  का कूदना- फांदना 


तभी  दूसरे  कोने से  लो आ  धमके 

काले  बदरंग  अट्टाहस  लगाते 
रावण  के  जैसे  गरजते   कड़कते 
 बल  और शक्ति  का प्रदर्शन करते  
निगलते   बेबस  सफ़ेद  गोलों को 
अँधेरे  की चादर  को दूर तक फैलाते 
काले सैनिकों की  टोली ने मानो 
किसी को भी आज ना  छोड़ने की ठानी हो 


ओहो  ,  आज  फिर  युद्ध  होने  को है 

सफ़ेद-काले गोलों की  गुथ्थम - गुथ्था
मोटे - मोटे लुढ़कते  आंसुओं की  बूँदें 
फिर हिचकी लेती तेज़ फुहारों की  झड़ियाँ 
कड़कती बिजली और  गरजते बादल 
आज तो घमासान जोरों पर  छिड़ी है 
ढक  गया आकाश श्वेत श्याम पटल से 
निर्णय  लिखने  की बस  पूरी तयारी है 


पर जीत तो आखिर मैं निर्मल की  होती है 

वो देखो काली बदली के सीने को  चीरकर 
प्रफुल्लित हो नीले आकश मैं  गर्व  से उतरा 
विजयी  भाव से नाचता  सफ़ेद रुई  का मोर 
सूरज की किरणों के सुरताल पर लयबद्ध हो 
ख़ुशी की हिलोरों  से  झूमता -  झामता 
कलगी पर इन्द्रधनुष के रंगों की रेखा 
पंखो पर बिखरा कर  गुलाबी उजाला 

Thursday, June 6, 2013

निर्माण




 रचेता  ने  जब  इस 
 संसार की रचना  रची 
कुछ  सोच  कर ही उसने 
फिर जोड़ी  गढ़ी 
फूलों को रंगों से सजा 
 बादल  मैं पानी को भरा 
धरती को बना  जीवों का डेरा 
आकाश को दी  तारों की छटा 


नर  और  नारी  को बना 

नवजीवन का सूत्र   दिया 
पर जब भी इस  संरचना मैं 
उलट  फेर  होने लगे 
आधार  की नींव  हिल जाने से 
सब जर्जर  हो जाए 


दूध  और पानी  रहे तो 

मिल कर सोपान बने 
पानी और रंग मिले तो 
इन्द्रधनुष भी बन जाए 
पर खून की नदियाँ बहने से 
सब बदरंग हो जाए 


पानी और छाँव मिले  तो 

मुरझाया  पौधा  हरा बने 
खाद और सही देखभाल मिले तो 
फूल और पत् ते  भी उग जाएँ 
पर ठूंठ  बना के वृक्षों  को 
सब बंजर  ओर  जाए 


प्रेम और विश्वास  मिले तो 

जीवन हर्षाए 
साथ  और सहभाग मिले तो 
खुशियाँ बरसाये 
पर छल , द्वेष , अभिमान  रहे तो 
रिश्ते  धूमिल हो जाए 


जीव , पशु  , पक्षी , पौधे 

सब एक दूजे के पूरक हैं 
जो खुद को प्रबल समझ 
दूसरे का तिरस्कार  करे 
इश्वर  की इस रचना का 
अपमान करे, संहार करे 
तो संसार नष्ट हो जाए 


चलो आज  कुछ नया करे 

एक बीज डाल कर प्रेम का 
आशा की किरण से  रोशन कर 
स्नेह अमृत रस बरसा कर 
रिश्तों का निर्माण करें 
इश्वर  से क्षमा मांग कर 
नतमस्तक  हो जाएँ 

Sunday, May 19, 2013

कोई


पूछते  हैं   आज मुझसे 
अब  ज़िन्दगी मैं   कोई तो नहीं ?
हँस   कर कहती हूँ तभी मैं 
ना , कोई और नहीं है अब 
नासमझ हैं लोग कितने 
जो इतना फरक भी न समझें 
कोई जब  बने खुद ज़िन्दगी 
तो उस " ज़िन्दगी"  के सिवा 
कोई और  कहाँ   है  अब 

स्वरांजली



ह्रदय की हर एक शिरा  में 
अविरल बहती रस धारा हैं 
व्याकुल मन में पीर बढाती 
सुरों के इस लय ताल में 
मद मस्त थिरकती विद्युत गति से 
संगीत की ये स्वर लहरियाँ  हैं 

कभी मौन बनी किसी वेदना को 
विचलित सी संवेदना को 
हर एक भाव को शब्द देती 
स्वरों से सुसज्जित कर के 
कंठ से मुख तक आती 
ह्रदय की ये अनुभूतियाँ  हैं 

ह्रदय से ह्रदय के सेतु को 
कच्चे सूत से बांध कर 
जीवन का संचार फूंकती 
अव्यक्त व्रती का दर्पण बन 
ईश  का वंदन करने को 
अकुलाती ये स्वरांजलियाँ  हैं  ..

Saturday, May 11, 2013

खज़ाना


जो  साथ कभी देखे थे हमने 
कुछ  ख्वाब सुनहरे रख्खे हैं 
जो साथ बिताए थे हमने 
कुछ पल  रुपहले रख्खे हैं 
 इन  मीठी यादों से भरकर 
एक खज़ाना रख्खा  है 


जीवन  के  पथ  पर चलकर 

रस मधुर सभी मैं बरसा कर 
पग प्रेम  प्यार  विशवास  सहित 
ह्रदय सभी को लगा कर 
एक दिन पहुंचेंगे उस संध्या पर 
जब रीत चुका होगा सब कुछ 


तब खोलेंगे अनमोल घरोहर 

संचित है जो वर्षों से 
फिर धीरे धीरे खरचेंगे 
बहुमूल्य निधि के संचय को 
जो मन को फिर हर्शायेगा 
खाली  दामन भर जायेगा 

तन्हाई





क्यूँ डरते है लोग तन्हाई के नाम से 
मुझे तो अज़ीज़ है यही तन्हाई 
जिस में तेरे अक्स उभरते है 
और इन्ही अँधेरे कोनो में 
साये एकाकार हो जाते है 

अकेलेपन से बचने की कोशिश में 
ना जाने कितने तरीके अपनाते है 
पर ये तन्हाई की गूँज ही तो है 
जिस में खुद की आवाज़ सुनाई देती है 
और अपने आप से रूबरू हो पाते है 

तन्हाई से जितना दूर भागोगे 
ये उतनी पीछा करती आएगी 
जो मुस्कुरा कर इसे गले लगा लो 
तो ये मंथन के रास्ते दिखलाएगी 
चेतन से अवचेतन के सेतु बनाएगी