Friday, August 23, 2019

मुर्दे

शुष्क होठों की पपडियां 
बयान करती हैं वो अनकहे किस्से 
जो परत दर परत जम गए 
भिंचे अधरों की संद मैं
कसमसाते हैं कभी
खुली हवा मैं सांस लेने के लिए
त्रिशंकु की अवस्था मैं
कंठ में अटके बोल
टूटे पखों का दर्द लिए
कराहते हैं मुठी मैं बंधे ख्वाब
जकड़े उँगलियों की काल कोठरी मैं
उम्र कैद की सजा काटते
क्या गुनाह था इनका
जो अजन्मे शिशु की तरह
गर्भ मैं ही कर दिए गए
क्षत विक्षत , निष्प्राण
हृदय मैं जन्मे प्रेमांकुर को
छल कपट के फंदे ने
चिर निद्रा मैं सुला दिया
अपनी जननी के आँचल मैं
.
बेमौसमी बरसात के छींटों से
कब्रगाह की मिटटी में दबे
ज़ज़्बात कभी कभार सील उठते हैं
पर मुर्दे फिर नहीं जिया करते हैं 


मंजरी