Thursday, October 21, 2010

मोहब्बत


















उनकी सूरत देख के 
ज़ज़्बातों मैं नए जोश 
जो भरने लगे हैं .... 
और अब दिल की ये आरज़ू है 
कि  गर बीच में ये फासले ना होते 
तू हम उन्हें अपने आगोश में  भरते 
उनकी पेशानी, अधरों और तन बदन को चूमते 
और उनके कदमो में सजदा करते ...... 


उनकी चाहत देख के 
हम भी कुछ होश 
अब खोने लगे हैं ...... 
और अब ये आलम है 
कि  गर बीच में ये फासले ना होते
तो हम भी वही सब उनके साथ करते
उनकी मोहब्बत का उसी बेबाकी से जवाब देते 
और उन्हें ऐसे जाने न देते ...... 




Thursday, August 5, 2010

Woods






















There was a little girl named Sheena
Who lived in a small village Kaleena
Surrounded by hills in the midst of woods
Her father to be a shrewd money-lender
And mother was a timid sweet vendor
She had neither the siblings nor a friend
To share some jokes or play in the sand
The little quiet creature, body so tender
With the blue hazel eyes ; shy, short, slender
The lost little soul after the whole day toil
Picked her basket to collect some berries
Stepped swiftly and calmly in the nearby woods


The trees stand tall, mighty and all
With creepers entwining in order to crawl
And branches long, shooting grown as hoods
The grass waving happily like merry-go-round
And flowers dancing merrily in whistling sound
The leaves that scattered all around ; soft to tread
To make a smooth green feather like bed
The birds singing tweet-tweet ; a joyful song
And the rabbits jumping; thud in a throng
The fire-flies hovering, glittering the darkness
The whole seems like a heaven on the earth
A beautiful little world in the heart of woods.


The father and the mother and all the villagers
stared at girl in dismay and raised their queries
to find the reason for wandering in the woods
There are houses and roads, as well as ground to play
Shops to see and money to spend to be happy and gay
Taste spicy n sweets and wear clothes poppy and may
Hustle and bustle with the flocks of vendor
Brim and sublime with beauty and splendour
Now open your mouth and give some clue
Behind penetrating like this alone and subtle
Full of danger in the dark wild woods.


Smiling with enthusiasm and looking at all
Spurted the words so soft and small
What pleasure she found amongst the woods
Away from all evils and lies of people
From all men hatred, shroud and feeble
There exist a true and distinct garden of Eden
Full of life, peaceful, happy and un-trodden
This is the glimpse of real beauty and divine
It fills the heart with pure joy to align
That’s why she comes here to spend some time
A rather more better place than this and thine
Where dwells the God’s angels in the woods.

Sunday, July 11, 2010

Unforgettable





















How could I forget
that auspicous day.....
When I was enchanted
by your magnetism;
When I was devouted
by your magnificience;
When I was frozen
by your endurance;
When I was molten
by your humanism.

How could I forget
that authentic moment.....
When I was lost in
your sultry eyes;
When I was subdued
by your vivid smile;
When I was swayed in
your gracious arms;
When I was absorbed
by your lucid aura.

How could I forget
that attributive night......
When I quivered
in your embrace;
When I burned
with your passion;
when I besotted
in your Love;
When I merged
with your possesion.

Wednesday, June 9, 2010

फिर भी



क्या हुआ जो इन राहों की दूरियां है 
क्या हुआ जो हालातों की मजबूरियां हैं 

क्या हुआ जो ये अकेली रातें हैं 
क्या हुआ जो ना  हो सकी मुलाकातें हैं 

क्या हुआ जो ये ज़माने के सितम हैं 
क्या हुआ जो ये आँखें नम हैं 

क्या हुआ जो अधूरी बातें हैं 
क्या हुआ जो यादों की बारातें हैं 

क्या हुआ जो ये होंठ निशब्द हैं 
क्या हुआ जो ये सपनो पे पैबंद हैं 

क्या हुआ जो ये कदम मायूस हैं 
क्या हुआ जो ये बाहें पशेमान हैं 

क्या हुआ जो ना  खुद पे इख्तियार है 
क्या हुआ जो ना ख़त्म होता इंतज़ार है 


फिर भी मुझे ये नाज़ है 
हर सूरत -ए -ऐतबार है 
कि  क़यामत क्यों ना  बरपा हो 
मैं उसकी हूँ वो मेरा है........ 



Monday, June 7, 2010

किसी रोज़



ऐसा भी एक पल आये किसी रोज़  
जब तेरी सुबहें हो बस मेरी खातिर 
और मेरी शामें हो बस तेरी जानिब 
जब तेरी नज़रें उठे बस मेरे मुखातिब 
और मैं नज़र आऊं बस तेरे मुताबिक़ ........

ऐसा एक लम्हा भी गुज़रे किसी रोज़ 
जब तेरे ज़हन में  फ़क़त मेरा ख़याल हो 
और मेरे ज़ज़्बातों मैं बस तेरा बयान हो 
जब तेरे आगोश में मेरी बसर हो 
और मेरे पहलु में तेरा आगाज़ हो  ........
.
ऐसा एक दौर भी आये किसी रोज़ 
जब तेरी ख्वाहिशों की इल्तिमास हो 
और मेरे इंतज़ार की इज़्तिराब हो 
जब  तेरे ख्वाबों की तामील हो 
और मेरी दुआएं खुदा को कबूल हो  ........


Wednesday, March 10, 2010

मेरे पास चले आना



जब बागों में गुल खिल जाएँ 
जब पत्ते पीले पड़ जाएँ   
जब सारी ऋतुएँ  बदल जाएँ 
 तब मेरे पास चले आना.. .... ....  

जब सूरज धूप दिखा जाए 
जब धुंध की बदली छंट जाए 
जब सुरमयी शाम ढल  जाए 
तब मेरे पास चले आना .. .... ....  

जब रात की चादर पड़  जाए 
जब घना अँधेरा छा जाए 
जब आस कोई कुम्हला जाए 
तब मेरे पास चले आना .. .... ....  

जब दिल शीशे सा चटक जाए 

जब दर्द से दामन भर जाए 
जब आंख से आंसू छलक  जाएँ 
तब मेरे पास चले आना .. .... ....  

जब यौवन का रस ढल जाए 
जब जीवन संध्या आ जाए 
जब संगी सभी बिछड़  जाएँ 
तब मेरे पास चले आना .. .... ....   

जब मेले से मन भर जाए 
जब सारे सपने तर जाए 
जब सबसे फुर्सत मिल जाए 
तब मेरे पास चले आना .. .... ....  

Monday, March 1, 2010

चाँद की तमन्ना


ए   चाँद तुझे पाने की तमन्ना की है 
अब इस जुर्म की कोई सजा भी मुक़र्रर हुयी है 

तेरे नूर-ए -जमाल  की लकीरें जो हम पे पड़ी 

हमने चांदनी को खुद में समाने की ज़ुर्रत की है 
ए   चाँद तुझे पाने की तमन्ना की है 

 तेरे अक्स की चमक जो पानी में बही 
हमने सागर मैं खुद को डुबाने की कोशिश की है
 ए   चाँद तुझे पाने की तमन्ना की है 

तेरे ज़ीनत की कशिश जो फलक पे दिखी 

हमने ज़मीन छोड़ आसमानो पे चलने की हिमाकत की है 
ए   चाँद तुझे पाने की तमन्ना की है 

तेरी एक झलक जो किसी रोज़ ना दिखी 

हमने  अमावस के अंधेरों में उजालों की जुस्तुजू की है 
ए   चाँद तुझे पाने की तमन्ना की है

तेरा दीदार पूरा जब से हुआ 

हर रात बद्र की रात हो , ये सजदा की है 
ए   चाँद तुझे पाने की तमन्ना की है