Monday, January 25, 2016

बहती हवा के संग






चुरा के कुछ रंग फूलों के चुपके से
कुछ टुकड़े उन टूटे सितारों के लगा कर
फिर निकल पड़ी मैं अपनी चुनरी को सजा कर
हवा के संग बहती , बतियाती- मुस्काती
अपनी ही किसी धुन मैं मगन , मांग के चहक 
थोड़ी सी, उडते पंछियों से उधार। ...


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